रेखा… हमेशा सीधी नहीं होती।
रेखा… हमेशा सीधी नहीं होती।
कभी-कभी… वो थम जाती है।
चेहरा बनता है… फिर घुल जाता है।
जैसे यादों में कोई नाम… अधूरा सा।
मैं चेहरे नहीं बनाता…
मैं उन पलों को पकड़ता हूँ
जो चुपचाप बीत जाते हैं।
स्याही मेरी नहीं मानती…
बहकती है, फैलती है,
जैसे किसी भूली हुई बात की परछाई।
हर रेखा के पीछे…
एक सवाल छुपा होता है।
ये चित्र…
रूप और अरूप के बीच रहते हैं।
जहाँ चेहरा साफ़ नहीं होता,
वहाँ शायद… वो सच होता है।
और मैं वहीं रहता हूँ
उस धुंधले किनारे पर,
जहाँ सब कुछ… साफ़ से थोड़ा कम होता है।
– प्रकाश ठोंबरे